बीमार की अयादत की दुआ | मरीज से मिलने की दुआ अरबी, हिंदी, अर्थ और फ़ज़ीलत
इस्लाम में बीमार की अयादत (मुलाक़ात) करना बहुत बड़ा सवाब का काम है। जब कोई मुसलमान बीमार हो, तो उससे मिलने जाएँ, उसकी हिम्मत बढ़ाएँ और उसके लिए शिफ़ा की दुआ करें। नबी ﷺ ने बीमार के लिए कई मस्नून दुआएँ सिखाई हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध दुआ यह है:
Arabic Text
أَسْأَلُ اللَّهَ الْعَظِيمَ رَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ أَنْ يَشْفِيَكَ
हिंदी उच्चारण
असअलुल्लाहल अज़ीम, रब्बल अर्शिल अज़ीम, अय्यश्फ़ियक।
हिंदी अर्थ
मैं महान अल्लाह से, जो अर्श-ए-अज़ीम का मालिक है, दुआ करता हूँ कि वह आपको पूर्ण शिफ़ा अता फरमाए।
हदीस संदर्भ
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
"जो व्यक्ति किसी बीमार के पास जाए जिसकी मौत का समय न आया हो और उसके पास सात बार यह दुआ पढ़े, तो अल्लाह उसे उस बीमारी से शिफ़ा अता फ़रमाता है।"
संदर्भ: Jami' at-Tirmidhi, हदीस: 2083 (हसन)
फ़ज़ीलत
बीमार की अयादत करना सुन्नत है।
अल्लाह की रहमत और बरकत नाज़िल होती है।
बीमार के लिए दुआ करना नेक अमल है।
सात बार यह दुआ पढ़ना मस्नून है।
अयादत करने वाले के लिए भी सवाब लिखा जाता है।
कब और कैसे पढ़ें
जब किसी बीमार से मिलने जाएँ।
उसके सिरहाने या पास बैठकर प्यार और हमदर्दी से दुआ करें।
ऊपर दी गई दुआ 7 बार पढ़ना बेहतर है।
साथ ही उसके लिए दिल से शिफ़ा की दुआ करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. बीमार की अयादत करना सुन्नत है?
जी हाँ, यह नबी ﷺ की सुन्नत है और बहुत सवाब का काम है।
2. दुआ कितनी बार पढ़नी चाहिए?
मस्नून तरीका 7 बार पढ़ना है।
3. क्या अपने लिए भी यह दुआ पढ़ सकते हैं?
जी हाँ, अपने लिए या किसी भी बीमार मुसलमान के लिए पढ़ सकते हैं।
4. क्या गैर-मुस्लिम बीमार से मिलने जा सकते हैं?
जी हाँ, अच्छे व्यवहार और इंसानियत के नाते मुलाक़ात की जा सकती है।
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