रोज़े की दुआ (सहरी और इफ्तार की दुआ) | अरबी, हिंदी उच्चारण, अर्थ और फ़ज़ीलत

 
रोज़े की दुआ अरबी, हिंदी अर्थ और उच्चारण

रोज़ा अल्लाह की इबादत है और दुआ उसकी रहमत का ज़रिया।

रोज़ा इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक महत्वपूर्ण इबादत है। रमज़ान के महीने में मुसलमान अल्लाह की खुशी के लिए सुबह से शाम तक रोज़ा रखते हैं। रोज़ा रखते समय सहरी और इफ्तार की दुआ पढ़ना सुन्नत और बरकत का कारण है। इस लेख में आप रोज़े की दुआ अरबी, हिंदी उच्चारण, अर्थ, फ़ज़ीलत और सही तरीका जानेंगे।


अरबी टेक्स्ट

  सहरी (रोज़ा रखने की नियत)

                                          وَبِصَوْمِ غَدٍ نَوَيْتُ مِنْ شَهْرِ رَمَضَانَ

  इफ्तार (रोज़ा खोलने की दुआ)

اللَّهُمَّ إِنِّي لَكَ صُمْتُ وَبِكَ آمَنْتُ وَعَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ وَعَلَى رِزْقِكَ أَفْطَرْتُ


हिंदी उच्चारण

सहरी की नियत

व बि सौमि ग़दिन नवैतु मिन शह्रि रमज़ान।

इफ्तार की दुआ

अल्लाहुम्मा इन्नी लका सुम्तु, व बिका आमन्तु, व अलैका तवक्कल्तु, व अला रिज़्किका अफ़्तर्तु।


हिंदी अर्थ

सहरी की नियत

मैं रमज़ान के इस रोज़े की नियत करता हूँ।

इफ्तार की दुआ

ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा, तुझ पर ईमान लाया, तुझ पर भरोसा किया और तेरे दिए हुए रिज़्क से रोज़ा खोला।


संक्षिप्त तफ़्सीर

रोज़े का मकसद केवल भूखा-प्यासा रहना नहीं बल्कि तक़वा, सब्र और अल्लाह की इबादत हासिल करना है। रोज़ा इंसान को गुनाहों से बचने और नेकियों की तरफ़ बढ़ने की प्रेरणा देता है।


हदीस / कुरआन संदर्भ

सूरह अल-बक़रह (2:183) रोज़ा तुम पर फ़र्ज़ किया गया ताकि तुम परहेज़गार बनो।

सहीह बुख़ारी  एवं सहीह मुस्लिम: रोज़ेदार की दुआ इफ्तार के समय क़ुबूल होने वाली दुआओं में से है।


फ़ज़ीलत

अल्लाह की विशेष रहमत प्राप्त होती है।

गुनाहों की माफ़ी का ज़रिया।

तक़वा और सब्र पैदा होता है।

रोज़ेदार के लिए जन्नत का विशेष दरवाज़ा "रय्यान" है।

इफ्तार के समय की दुआ क़ुबूल होने की उम्मीद होती है।


कब और कैसे पढ़ें

सहरी समाप्त होने से पहले रोज़े की नियत करें।

सूर्यास्त के बाद इफ्तार करते समय दुआ पढ़ें।

खजूर और पानी से इफ्तार करना सुन्नत है।

दुआ दिल की सच्चाई और इख़्लास के साथ पढ़ें।


महत्वपूर्ण बातें

रोज़े की नियत दिल से करना पर्याप्त है।

दुआ पढ़ना बहुत अच्छा और सुन्नत अमल है।

इफ्तार में जल्दबाज़ी करना सुन्नत है।

रोज़े की हालत में झूठ, गाली और बुरे कामों से बचें।


FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. क्या रोज़े की नियत ज़ुबान से करना ज़रूरी है?

नहीं, दिल की नियत काफ़ी है।

2. इफ्तार की दुआ कब पढ़ें?

रोज़ा खोलते समय।

3. क्या बिना दुआ पढ़े रोज़ा हो जाता है?

हाँ, रोज़ा हो जाता है, लेकिन दुआ पढ़ना बेहतर और सुन्नत है।

4. क्या बच्चे भी यह दुआ पढ़ सकते हैं?

जी हाँ, सभी मुसलमान इसे पढ़ सकते हैं।


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निष्कर्ष

रोज़ा अल्लाह की बहुत बड़ी इबादत है। रोज़े की नियत और इफ्तार की दुआ पढ़कर इंसान अल्लाह की रहमत और बरकत हासिल करता है। हमें रमज़ान के हर रोज़े को इख़्लास और सुन्नत के अनुसार पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए।



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Author.  RahmatKiDua Team

Category.  इस्लामी ज्ञान / रमज़ान / दुआएँ


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